What is Gaganyaan Mission? (Hindi) ISRO Gaganyaan Mission 2022, गगनयान मिशन 2022.

सबसे पहेले ISRO के बारेमे एक बात स्पष्ट कर दूँ, के वैज्ञानिक डो. विक्रम साराभाई के दिशासिचान अनुसार ISRO का ध्येय हमेशा से ही अमेरिकन और रशियन स्पेस एजेंसीज से अलग रहा है. ISRO सेन्सिंग, संदेशाव्यहवार, हवामन का निरीक्षण जैसे व्यहवारलक्षि और लोक-उपयोगी प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाता रहा. इंसान को चाँद पर भेजना, गुरु और शनि ग्रह पर यान भेजना, मंगल पर रोबोटिक यान चलाना जैसे पब्लिसिटी दिलाने वाले प्रोजेक्ट पहेलेसे ही ISRO के मेन्यू लिस्ट में नहि थे. वरना ISRO ने कब का उसपर काम करना शुरू कर दिया होता.

पर आज इसरो को ये सब ज़रूरी लग रहा है. क्यूँकी स्पेस जगत में डो. विक्रम साराभाई के समय में वो चेलेंजीस नहि थे जो आज है. साराभाई के ज़माने में Globalization नहि था, आज है. स्पेस जगत में आज हमारी चीन और अमेरिका जैसे देशो से स्पर्धा हैं.

इसी लिए हमने स्पेस जगत में कूदते हुए ओकटोबर 2008 में चन्द्रयान-1 और नवेंबर 2013 में मंगलयान-1 जैसे सफल मिशन आयोजित किए. ऊपर से 15 ओगस्त 2018 के दिन भारत के प्रधानमंत्री ने लाल क़िले पर संबोधन देते हुए 2022 की डेडलाइन की घोसना कर दी. जिसके चलते अब भारतीय अंतरिक्ष-यात्रीयो को स्पेस में भेजने का मिशन ज़ोरों शोरों से शुरू हो गया है. अब भारत अपने अंतरिक्षयात्री स्पेस में भेजेंगा.

अंतरिक्षयात्रीयो के लिए इंग्लिश में उपयोग किया जाने वाला शब्द एस्ट्रोनॉट मूल ग्रीक शब्द एस्ट्रो मतलब स्टार और नॉट मतलब यात्री को दर्शाता है. सन 1929 से एस्ट्रोनॉट शब्द का उपयोग किया जाने लगा. रशिया अंतरिक्षयात्रीयो के लिए कॉज़्मोनॉट शब्द का प्रयोग करता है तो चीन में उसे ताईकोनॉट कहेते है. अब भारत जो अंतरिक्षयात्री स्पेस में भेजने वाला है उन्हें व्योमनॉट कहा जाएगा. और हमारे व्योमनॉट्स जिसमें बेठेंगे उस स्पेसक्राफ़्ट को गगनयान कहा जाएँग. जो पृथ्वी से 400 किलोमीटर दूर स्पेस में 28,254 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चक्कर गलाएगा.

व्योमनॉट्स बनने की एलिजिबिलिटी क्या है?

ISRO ने व्योमनॉट्स बनने की लायकात अभी तक स्पष्ट नहि की है. लेकिन वो अमेरिका और रशियन स्पेस एजनसी से ज़्यादा भिन्न नहि होगी.

रूपरेखा के तौर पर देखे तो, व्योमनॉट्स बनने के लिए उम्र 40 साल से कम होनी चाहिए. हाइट 5”11 फ़िट से कम होनी चाहिए. एंजिनियरिंग की डिग्री होनी चाहिए. उम्मीदवार ख़ास कर फ़िज़िक्स में एक्स्पर्ट होना चाहिए. इसके साथ अगर वो फ़ाईटर प्लेन का पाईलेट हो तो अति उत्तम. जैसे रशियान यूरी गगरीन, अमेरिकन आर्मस्ट्रोंग और भारतीय राकेश शर्मा थे. G-forge को सहेने के लिए वायुसेना के साथ नौसेना का उम्मीदवार भी फ़िट होगा. उम्मीदवार को कमसेकम 1500 घंटे का फलाइंग एक्सपीरियंस होना चाहिए. और आख़िर में उसमें विपरीत परिस्थिति में भी उतनी ऊँचाई पर क्विक डिसीजन लेने में क्षमता होनी चाहिए. उसका मनोबल फ़ौलादी और बुद्धि तीव्र होनी चाहिए.

व्योमनॉट्स को किस प्रकार की तालीम दी जाएँगी?

एलिजिबिलिटी में पास होने वाले उम्मीदवार को खार ट्रेनिंग दी जाती है. स्पेसक्राफ़्ट में यात्रा के दौरान शुरुआती गुरुतवाकर्षण के कारण अंतरिक्षयात्री को 3.2 जितना G-Force सहना पड़ता है. लहू के साथ शरीर के सारा प्रवाही वज़नदार हो जाता है. दिमाग़ तक रक्त पहोचाने के लिए दिल ज़ोरों से धड़कता है, परिणाम स्वरूप धड़कने बढ़ जाती है. दृष्टि स्थिर नहि रह पाती. इस परिस्थिति में अगर आप ट्रेइन ना हो तो मूरछित भी हो सकते हो. इस लिए विपरीत परिस्थिति को सहने के लिए व्योमनॉट्स को लगभग 2 साल की ट्रेनिंग दी जाएँगी.

ट्रेनिंग में उम्मीदवार को अंतरिक्षयात्रीयो को सुपरसोनिक स्पीड से जेट को होरिजोंटल लाइन में आगे बढ़ाना होता है और अचानक टर्न देकर जेट को वर्टिकल लाइन में गुरुत्वकर्षण के विरुद्ध उड़ाना होता है. इसमें इतना G-Force लगता है के ट्रेनि को पूर्ण अनुभव हो जाता है. बेहद फ़ोर्स के कारण इस परिस्थिति में औसत 4.5 किलोग्राम वज़न वाले मस्तिष्क का वज़न 18 किलोग्राम हो जाता है. और इस परिस्थिति में उसे अपनी सूजबूज बनाए रखनी होती है.

इसके उपरांत 400 किलोमीटर स्पेस में 0 ग्रेविटेशन की स्थिति बनती है. इसलिए पृथ्वी पर तो 0 ग्रेविती बनाई नहि जा सकती, लेकिन wrighlessness का महोल खड़ा किया जाता है. जिसके लिए दो पद्धति इस्तेमाल की जाती है. एक ट्रेनि को स्पेस-सूट पहेनाकर पानी में डाला जाता है. संतुलन के लिए वज़न बनाया जाता है. जिससे वो दुबे भी नहि और ऊपर भी ना उठ सके. सटेच्यु बने ट्रेनि को वज़न रहित होने का अहेसस होता है. ये महावरा लम्बी तालीम माँगने वाला है.

दूसरी तालीम ये है के प्लेन को पूरे 35,000 फ़िट ऊँचाई पर चढ़ने के बाद उसे वहाँ से ग्रेविटी में फ़ोल किया जाता है. भैतिकि सिद्धांत Law of Falling Object के अनुरूप गिरते प्लेन के अंदर पदार्थ का वज़न शून्य हो जाता है और 0 ग्रेविटी का अनुभव होता है.

ट्रेनिंग के लिए ISRO बेंगलुरु के पास एक बड़ी जगह बनाई गई है. ये सब तालीम वहाँ दी जाएँगी.

व्योमनॉट्स की लाइफ़-सपोर्ट सिस्टम कैसी होगी?

अंतरिक्षयात्रीयो की लाइफ़-सपोर्ट सिस्टम उनके स्पेससूट में ही होंगी. ISRO ने व्योमनॉट्स के लिए स्पेससूट गुजरात के बडोडा की एक कंपनी से तैयार करवाया है. क़ीमत है कुछ 10 लाख रुपए. ये स्पेससूट अंतरिक्षयात्रीयो को उनका पर्सनल वातावरण मुहैया करवाता है. मतलब पृथ्वी के वातावरण जैसा. जो उन्हें ओकसीजन की पूर्ति करवाएँग, शरीर के टेंपरेचर का संतुलन रखेंगा और high-g तथा विकिरणो से सुरक्षा देगा. इस स्पेससूट का रंग घट्टकेसरी रखा गया है. क्यूँकी ये रंग स्पेस में साफ़ साफ़ दिखाई देता है.

दोस्तों समानव अंतरिकक्षयान भेजने के लिए ISRO के पास वक़्त कम है और डेडलाइन के चलते 2022 तक हमें ये काम किसी भी हाल में करना होगा. देश की गरिमा का सवाल है…

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