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मंगल ग्रह पर जीवन (Life on the Mars)

क्या सूर्यमंडल के अन्य ग्रहों की तरह मंगल-ग्रह भी शुष्क और बेजान है? या वहां भी कभी जीवन की शुरुआत हुई थी? क्या मंगल पर एलियन हो सकते है? क्या ये लाल ग्रह कभी पृथ्वी की तरह एक हरा-भरा ग्रह था? आइये इन सब सवालो के जवाब जानते है.

यूनानी लोग मंगल ग्रह को Aeas कहते थे, जिसे युद्ध का देवता माना जाता है. शायद लाल रंग होने के वजह से इसे ये नाम दिया होगा. इस गृह की मिटटी में लोह खनिज को जंग लगने के कारन यह लाल दिखता है. सूर्यमंडल का सबसे बड़ा पर्वत मंगल पर स्थित है जिसको ओलिंप मोन्स नाम दिया गया है. और यह पर्वत 25 किलोमीटर ऊँचा है. यह ग्रह सूर्य के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने में पूरा 687 दिन लगता है. यह सूर्यमंडल में चौथे नंबर का ग्रह है जो पृथ्वी का पडोसी है. धरती से मंगल का अंतर 5,46,00.000 किलोमीटर है.

मंगल पर जीवन:
वैज्ञानिक मानते है के मंगल ग्रह पर भूतकाल में जीवन पनपा होना चाहिए. इस मान्यता के दो सबूत है. एक प्रत्यक्ष है तो दूसरा परोक्ष है. मंगल की सतेह को देख कर ये पता चलता है के दूर के भूतकाल में वहां जीवन का अस्तित्व होंगा. क्योंकी समुद्र और नदियों के पानी द्वारा मंगल की सतेह पर बनी निशानिय आज भी साफ-साफ दिखाई देती है. और ये निशानिय कई किलोमीटर तक बनि हुई है. अध्ययन से यह भी मालुम हुआ के मंगल पर शुरूआती करोडो सालो तक वातावरण भी करीब पृथ्वी जैसा और वोर्म था. पानी और अनुकूलित वातावरण जहाँ मौजूद हो वहां जीवन की शुरुआत अवश्य होनी चाहिए.

दुसरा आधारभूत प्रमाण ये है के, सन 1998 की साल में संसोधाको को अंतरिक्ष से गिरनेवाली एक उल्का हाथ लगी. जिसको वैज्ञानिकोने ALH84001 नाम दिया. उनके अनुसार ये उल्का मंगल ग्रह की है. दर असल वैज्ञानिको के अनुसार अतीत में मंगल ग्रह पर कुछ लगुग्रह गिरे थे. तब टकराव की वजेह से उसके आस-पास के मंगल के कई खड़क और सतेह के तुकडे टूट कर उतनी तेज़ गति से आकाश में उड़े थे के उसके गुरुत्वीय घेरे के भी पार चले गए. और ये तुकडे स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में सूर्य के चक्कर काटने लगे. ऐसा अवकाशी स्टफ्फ पृथ्वी के आस-पास भी बिखरा पड़ा है. अब मंगल से अलग हुए वो पिंड सदियों तक सूर्य के चक्कर लगते हुए पृथ्वी की भ्रमण कक्षा में आ गए. और पृथ्वी के गुरुत्वीय घेरे ने उसे खिंच लिया. ALH84001 वही टुकड़ा है जो पूर्ण रूप से जलने से बच गया और पृथ्वी पर गिरा.

संसोधन के अनुसार ALH84001 नाम की ये उल्का 1.5 करोड़ साल पहेले मंगल ग्रह से अलग हुई थी और लाखो सालो तक उसने सूर्य के चक्कर लगाये. और आज से लगभग १४,000 साल पहेले पृथी के दक्षिण ध्रुब के विस्तार में आ गिरी. जो 1998 में वैज्ञानिको के हाथ लगी. उल्का की रचना से ये पता लगता है के उसका उद्भव मंगल ग्रह पर ही हुआ होंगा इसमें कोई दोराहे नहीं है. संशोधको ने जब इसकी जाँच की तो उस उल्कापिंड में शुक्ष्मजीवो के अस्मि मिले. रेडियो कार्बन डाटिंग से ये साबित हो गया के यहाँ जीवाश्म 3.6 अरब साल पुराने थे/ सिर्फ इतना ही नहीं, किन्तु मंगल ग्रह के ये जीवाश्म के अवशेष आज से 3 अरब साल पहेले जन्मे हमारी पृथ्वी के जीवाश्म के जैसे ही थे. फर्क मात्र इतना के पृथ्वी के जीवो को उत्क्रांति के विकास के चलते फलने फूलने का मौका मिला और मंगल ग्रह के लगातार बदलती परिस्थिति के कारण वहां के जीवन का अंत हो गया.

नासा के वैज्ञानिको का मानना है के मंगल की सतेह के ऊपर भले ही आज पानी ख़त्म हो गया हो किन्तु सतेह के भीतर अब भी पानी मोजूद हो सकता है. और वहां हमारी तरह विक्सित ना सही पर शुक्ष्मजिव के रूप में एलियन होने की पूर्ण संभावना है. कुछ भौतिक-शास्त्रियों के अनुसार मंगल ग्रह पर कभी हम जैसी विक्सित सभ्यता भी रही होंगी जो परमाणु युद्ध के साथ ख़त्म हो गई. सच चाहे जो भी हो, पर ये लाल-ग्रह आज हम इंसानों के लिए खोज का एक एहम विषय बन चूका है. जिसके चलते नासा और इशारो जैसी बड़ी स्पेस एजंसिस ने मंगल पर खोजबीन का अपना अभियान जोरशोर से शुरू कर दिया है.

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