भयानक रात (A Suspense Thriller Horror Story)

हम बहोत ही गहरे 4 दोस्त थे. आशीष, कीर्ति, चिराग और मैं. हम चारो बचपन से ही साथ पले-बड़े. ये बात है 2003 की जब हम चारो 12वि कक्षा की एक्जाम पूरी कर के वेकेशन एन्जॉय कर रहे थे. एक दिन हम मेरे घर के टेरेस पर बैठ कर भुत-प्रेत के बारेमे बाते कर रहे थे. तब अचानक आशीष बोला

..
आशीष: मैं तो यार कोई भुत बुत में नहीं मानता.
कीर्ति: भाई कहना आसन है, जब सामने आता है तब पसीने छुट जाते है.
आशीष: भाई, कुछ होगा तो सामने आएगा ना?
उतने में कीर्ति और चिराग को मैं अपने मजाक में शामिल करते हुए चाय की चुस्की लेते हुए बोले, “तो क्यों न ट्राय किया जाए?” चिराग मेरी बात में सहमती देते हुए बोला, “हा बिलकुल हो जाये”
आशीष: हा मैं तो तैयार हूँ, बोलो क्या करना है?
10-15 सेकण्ड तक सब मौन हो गए. अचानक मौन तोड़ते हुए कीर्ति बोला….”रात के 1:30 (डेढ़) बजे सिविल हॉस्पिटल के postmortem room में आशीष को अकेले जाना होगा. और स्ट्रेचर (जिसके ऊपर लाश का postmortem होता है) उसके ऊपर 3 मिनिट तक सो के आना होगा. बोलो आशीष क्या खयाल है?”
आशीष: मैं तैयार हूँ.

(शर्त के मुताबित अगर आशीष ये करने में कामियाब हो जाता है तो हम उसे 500-500 रुपये देंगे. और आजीवन आशीष को हमारी गेंग का एक निडर शिपाही मानेंगे. और अगर वो डर जाता है और वापस आ जाता है तो हम उसे डरपोक मानेंगे और अगले 1 दिन तक उसे हिमे नास्ता करवाना होंगा.)
चिराग और मैं भी नए एडवेंचर के लिए तैयार हो गए.
हम चारो ने मिलके दुसरे दिन का प्लान बनाया. जिसमे बहार वोचमेन से छुपकर दीवाल कूदकर अन्दर जाना था. जहा अँधेरी लोबी में बहार हम तिन लोगो को खड़े रहेना था और आशीष को अकेले postmortem room के स्ट्रेचर पे सो कर कमरे में अपना फोटो लेना था और वापस आना था.
(नोध: ये घटना उत्तर गुजरात के एक नगर ‘पाटन’ की सिविल हॉस्पिटल की है. हॉस्पिटल बहोत बड़ी है. लगभाग 3 किलोमीटर में फैली हुई. और postmortem room ठीक बिचो-बिच है. हॉस्पिटल के पीछे के महोल्ले में मेरा घर है. वहासे सिविल के पीछे वाले गेट से हमे ऊपर से अन्दर दाखिल होना था.)
दूसरा दिन:
अब वो समय आ गया था जिसकी हम लोग बेसब्री से राह देख रहे थे. हम चारो दोस्त रात के 10 बजे पान के गल्ले पर इकठा हुए.
आशीष: भाई, क्यू ना अडवेंचर करने से पहेले एक एक पान हो जाये.
कीर्ति गल्ले वालेसे: चलो भाई कालिदास चार पान बनाओ.
कीर्ति: हा हा क्यों नहीं? पर अभी तक चिराग क्यों नहीं आया?
मैंने कहा अभी आता ही होगा.
उतने में पीछे से चिराग आया. चिराग अपने साथ एक केमेरा, एक निम्बू, और एक बड़ा छुरा (धारदार चाकू) लेकर आया था.
आशीष: अरे चिराग ये निम्बू और ये छुरा क्यों लाये हो?
चिराग: देख भाई, भुत है या नहीं उसका तो मुझे पता नहीं है. पर अगर है तो मैंने सुना है की भुत निम्बू औरे लोहे से दूर रहते है. इस लिए ये तेरी रक्ष के लिए है दोस्त.
(ये सब आशीष को और ज्यादा डराने के लिए था. पर आशीष डरने वाला थोड़ी था?)
आशीष: हा चल ला ये सब.. “आशीष ने चिराग के पास से केमेरा, निम्बू और छुरा ले लिया.”रात 12:30 बजे:
कीर्ति: चलो भाई, जानेकी तैयारी करो.
(हम चारो दोस्त सिविल हॉस्पिटल के पीछे के गेट को कूद कर अन्दर गए. वो एक अँधेरी काली रात थी. हॉस्पिटल के अन्दर के पेड़ भी उस रात भयानक लग रहे थे. रस्ते सुनसान थे. चारो तरफ मानो खौफ था. हम चारो हिम्मत करके postmortem room तरफ जाने वाली लोबी तक पहोचे. लगभग रत के 1 बजने की तयारी थी.)
कीर्ति: चल भाई आशीष, आज दिखादे की तू कितना निडर है.
आशीष: हा हा बिलकुल, आप तीनो यही खड़े रहो, और अगर कोई आये तो मुझे आवाज़ देना, मै अन्दर जा रहा हु. आशीष धीरे धीरे postmortem room की और बढ़ा.
कीर्ति चुपके से आशीष के पीछे गया.
आशीष थोडा आगे गया तभी धीमी आवाज मे कीर्ति ने मुझे कहा, सुन हितेश मै आशीष के पीछे जा रहा हूँ. उसे डराने के लिए. मैंने कहा ये सही नहीं होंगे, अगर वो सही में डर गया तो?
चिराग: नहीं यार थोडा डरेगा तभी मज़ा आएगा, तू जा कीर्ति…यहाँ आशीष postmortem room में पहोच चुका था. वहा room का दरवाजा खुला ही था और room के बीचो बीच बड़ा स्ट्रेचर पड़ा हुआ था. ये देख अकेले में आशीष भी डर गया था. वो धीरे धीरे स्ट्रेचर के पास पहोचा. आशीष हिम्मत करके स्ट्रेचर के ऊपर चढ़ के सो गया. वो एक हाथ से केमेरा निकाल के अपनी फोटो लेने जा ही रहा था के पीछे से कीर्ति उसे डराते हुए जोर से बोला भौऊऊऊऊऊउ…
कीर्ति कुछ समज सके उसके पहेले तो आशीष ने हाथ में पकड़ा छुरा जोर से कीर्ति के पेट में घुसा दिया.
हमने बहार चीख सुनी और जेसे ही हम दोड़ते हुए अन्दर गए तो देखा वह कीर्ति की लाश पड़ी थी, और आशीष जोरो से रो रहा था…

मैं और चिराग ये देखकर स्तब्ध हो चुके थे. एक मजाक अब एक भयानक मर्डर का साक्षी बन चूका था. वाकई में हम बहोत ही बड़ी भूल कर बैठे थे.
ये घटना के बाद पुलिस केस भी हुआ, पर आशीष की उम्र 18 से कम होने और मर्डर करनेका उसका कोई इरादा ना होनेकी वजह से उसे छोड़ दिया गया. हम समज चुके थे के एक भयानक मजाक की वजह से हम अपना बचपन का दोस्त खो चुके थे.

2005
एक दिन मै पाटन गया था तब चिराग का मुजपे फोन आया. उसने मुझे आशीष के घर मिलने जानेके लिए कहा. मैंने चिराग को हा बोला. हम दोने आशीष के घर गए.
आशीष के घर उसके मम्मी-पापा थे. वो हमे देख कर थोडा गुस्सा हुए. फिर आशीष की मम्मी रोते रोते बोली: आशीष!!! में क्या कहू आप लोगो को? आशीष अब वो आशीष नहीं रहा…
चिराग: पर आंटी हुआ क्या है ये तो बताये?
आशीष की मम्मी: आप खुद ही ऊपर जाकर देख लो.मैं और चिराग ऊपर आशीष के रूम में गए. वह हम आशीष की हालत देख कर दांग रहे गए.
…आशीष हवामे बाते कर रहा था, कभी खुद अपने आपको मारता था, तो कभी दीवाल पे सर फोड़ रहा था…..
आशीष के पापा ने हमारे पास आकर कहा: डॉक्टर कह रहे है की आशीष को स्किज़ोफेनिया नाम की भयानक मानसिक बीमारी हुई है. पर हमारा मन वो मानने को तैयार नहीं था. हम आशीष के पास गए और उसे बुलाया तो वो हमे पहचानता भी नहीं था. मन में धीरे धीरे कुछ बोल रहा था.
मैं अपने कान उसके मुह के पास ले गया तो मैं घभराकर चीख उठा हे राम…
मैंने जो सुना वो आशीष की आवाज़ ही नहीं थी, वो कीर्ति की आवाज़ थी और वो बोल रहा था की…“मैं आशीष को मार दूंगा मैं आशीष को मार दूंगा.”
मई और चिराग वहासे घभाराकर घर भाग गए.
2006
एक रोज़ हमे खबर मिली की आशीष की मृत्यु हो चुकी है.
मृत्यु की कोई ठोस वजह अभीतक जानने को नहीं मिली.
वो दिन हमारे लिए बड़े ही दुःख का दिन था. आज भी मै और चिराग मिलते है पर उस घटना को कभी याद नहीं करते. और कभी कोई मजाक या कोई नया एडवेंचर नहीं करते है…
नोट: ये कहानी आपके मनोरंजन के लिए बनाई गई है. सच में ऐसी कोई भी घटना घटित नहीं हुई थी.

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