जम्मू कश्मीर और 370 का पूरा इतिहास

कश्मीर, उत्तरी हिमालय में बसी एक ख़ूबसूरत दुनिया. लेकिन बदनसीबी ये है कि ये जगह सालों से राजनीति का शिकार होती रही है. आज कश्मीर आग की लपटो में जूज रहा है. आज यहाँ अमन नहि पर अशांति है, कश्मीर और वहाँ की आवाम की इस बदनसीबी के 3 कारण है.

(1) इतिहर की कुछ घटनाए, (2) राजनैतिक समीकरण और (3) धारा 370…

कश्मीर की अगर बात करे तो ये पूरा विस्तार और इसके सहित पंजाब, बलूचिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का भी बड़ा हिस्सा सन 1819 में भारत के पराक्रमी सिख महाराजा रणजीतसिंह जी ने जीत लिया था. और अपने साम्राज्य का हिस्सा बना दिया था. अब महाराजा रणजीतसिंह के देहांत के बाद 1846 में अंग्रेजो ने इस विस्तार के साथ पंजाब को भी जीत लिया. इसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने जम्मू और कश्मीर के प्रदेश को गुलाबसिंह डोगरा को 75,00,000 में बेच दिया. याद रहे के कश्मीर को ख़रीदने वाले गुलाबसिंह डोगरा पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह की सेना के सर्वोच्च सेनापति थे. अब पूरा जम्मू कश्मीर डोगरा सल्तनत का हिस्सा था, और सालों तक रहा…

अब साल था 1931 का. और इस दौर के अंग्रेजो को जम्मू-कश्मीर किसी भी हाल में वापस चाहिए था. इस दौर में कश्मीर के तत्कालीन महाराजा थे हरीसिंह; हरिसिंह गुलाबसिंह डोगरा के चौथे वंशज थे. यानी गुलाबसिंह के बेटे थे रणवीरसिंह, उनके बेटे थे प्रतापसिंह और उनके बेटे थे हरीसिंह… इस लिए ब्रिटिश हुकूमत ने महाराजा हरिसिंह से इस विस्तार को लीस पर लेने की माँग की और उसके बदले बड़ी रक़म ऑफ़र की. हरिसिंह नहि माने… इसलिए कूटनैतिक दावपेंचों में माहिर अंग्रेजो ने नयी चाल चली. उन्होंने एक ख़तरनाक षड्यंत्र बनाया जो आगे चल कर इस जन्नत को बर्बाद करने वाला था.

क्यूँकी तब जम्मू एंड कश्मीर की 77% जनता मुस्लिम थी इस लिए अंग्रेजो ने अपने दो ख़ास गुप्तमहोरे कश्मीर भेजे. एक थे पेशावर के अब्दुल क़ादिर, और दूसरे शक्ष थे कश्मीर के ही शेख अब्दुल्ला. इन दोनो को अंग्रेजो ने कश्मीर में हिंदू राजा के ख़िलाफ़ बग़ावत करने और लोगों को उपसने के लिए भेजा था. श्रीनगर में जाकर अब्दुल क़ादिर ने आग उगलना शुरू कर दिया. कश्मीर में हिंदू राजा के विरुद्ध में लोगों को भड़काया और लोगों के दिमाग़ में ज़हर भर दिया. राजा हरिसिंह को जब इस बात का पाता लगा तो उन्होंने अपनी पुलिस भेज कर क़ादिर को गिरफ़्तार करवा लिया. उनपर राजद्रोह का मुक़द्दमा चला.

जुलाई 13, 1931, अब्दुल क़ादिर के केस की सुनवाई का दिन था तब एक बड़ी भीड़ ने क़ादिर को छुड़वाने के लिए पुलिस पर पत्थराव किया. पुलिस ने जब लाठीचार्ज किया तो भीड़ भाग गई. लेकिन क़ादिर के पीछे शेख़ अब्दुल्ला ने अपना काम शुरू कर दिया और मुस्लिम लोगों को भड़का कर हिंदुओ की दुकाने जलाई. हिंदुओ ने भी इसका प्रतिकार किया और कश्मीर में अफ़रातफ़री मच गई. कश्मीर संप्रदयीक हिंसा की लपटो में जलने लगा… कश्मीर में हिंदू जनसंख्या में सबसे अधिक थे कश्मीरी पंडित. जो वहाँ के मूलनिवासी थे. सन 1931 और उसके बाद कश्मीरी पंडितो पर इतना अत्याचार हुआ के उन घटनाओं को इस एक विडियो में बता पाना मुश्किल है.

खेर, कश्मीर के दंगों में शेख़ अब्दुल्ला की भी भूमिका होनेका सामने आने से उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया. बाद में जब वो जेल से छूटे तो उन्होंने मुस्लिम कोनफ़रांस नाम का पक्ष बनाया.

अब स्वतंत्रता के साथ ही भारत के दो हिस्से हुए. वहाँ कश्मीर के राजा हरिसिंह ये तय नहि कर पा रहे थे के किसके साथ जया जाए. उन्होंने ये सोचा के अगर पाकिस्तान के साथ मिले तो ख़ुद के राजवंश दोगरा और कश्मीरी हिंदुओ का भावी ख़तरे में था. और अगर भारत में विलीन हुए तो उनको अपने राजशासन छोड़ कर लोकशाही को अपनाना होगा. और हरिसिंह किसी भी हाल में अपनी सत्ता खोना नहि चाहते थे. इस बीच शेख़ अब्दुल्ला ने हरिसिंह को पत्र लिखा, के जो हुआ उसे भूल जाए. और अब्दुल्ला ने ये भी लिखा के वो और उनकी पार्टी कश्मीर और कश्मीर के राजा के हमेशा वफ़ादार रहेंगे और कश्मीर का बुरा सोचने वाले किसिका भी प्रतिकार करेंगे. ये वास्तव में एक बड़ी शज़िश थी. लेकिन राजा हरिसिंह इस शजिस को समज नहि पाए और उन्हें शेख़ अब्दुल्ला की इन बातों में अवसर दिखा. उन्होंने कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाकर ख़ुद उनका संचालन करने की थान ली…

अब शेख़ अब्दुल्ला ने पंडित नहेरू को मिल कर पता नहि क्या पाठ पढ़ाया के नहेरू ने सरदार पटेल से टेम्परारी कश्मीर के विलिनीकरन का चार्ज छिन लिया. और सरदार देश के अन्य देशी रजवाड़ों के विलिनिकारन में बिजी हो गए. इसी बीच ऑक्टोबर 22, 1948 के दिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर अचानक आक्रमन कर दिया. इस बुरे वक़्त में महाराजा हरिसिंग को भारत की याद आइ. वे ताबडतोब विलिनिकरन के दस्तावेज़ों को लेकर दिल्ली पहोचे…

पाकिस्तान की इस हरकत की वजह से हरिसिंह ने अब सम्पूर्ण कश्मीर को भारत में विलिन करने का मन बना लिया था. हरिसिंह ने जवाहरलाल नहेरू और अन्य नेताओ के साथ एक ख़ास बेठक की, हरिसिंह चाहते थे के कश्मीर का भारत में विलय हो जाए और भारत शैन्य कार्यवाही करके पाकिस्तानी घुसपैठीयो को वहाँ से खदेड़ दे. पर नहेरू बेफ़िकर थे. बेफ़िक्री की इस बात को फ़ील्ड मार्सल माणेकशा ने 1994 में एक इंटरव्यव के दौरान कही थी. उन्होंने कहा की, उस मीटिंग में कश्मीर की समस्या को लेकर आए हरिसिंह के आगे नहेरू संयुक्तराष्ट्र, आफ़्रिका, रशिया, और ईश्वर के बारेमे बातें कर रहे थे. आख़िरकार सरदार पटेल ने ग़ुस्से से ऊँची आवाज़ में पूछा, जवाहरलाल आपको कश्मीर चाहिए, के फिर दे देना है? तब नेहरु ने उत्तर दिया “हाँ बेशक मुझे कश्मीर चाहिए”… फिर सरदार बोले “तो फिर कश्मीर में लश्कर भेजने का ऑर्डर दे…” सरदार ने तुरंत नेहरु के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना जनरल माणेकशा को इशारा किया के आप जाओ ऑर्डर मिल गया… माणेकशा जल्दी से बाहर निकले और शैन्या कार्यवाही शुरू कर दी…

भारत के सैनिक पाकिस्तानी फ़ौज को खदेड़ते खदेड़ते आगे बढ़ रहे थे और लगभग 70%. कश्मीर को हमने छुड़वा लिया था. लेकिन इस पूरी घटना में चालबाज़ माउण्टबेटन ने अपनी भूमिका अदा की और मामले को संयुक्तराष्ट्र में ले गये. नहेरू ने UNO की सलाह को मान्य रकखा और युद्ध विराम की घोषणा कर दी. और कश्मीर का क़रीब 78,114 स्क्वेर किलोमीटर जितना विस्तार पाकिस्तान के अधिकृत रहा, जिसे आज POK कहा जाता है…

कश्मीर का बड़ा हिस्सा अब भारत के अंडर में था. उसे भी भारत के अन्य राज्यों के जितना ही दरज्जा देने की आवश्यकता थी पर अब इस चेप्टर में शेख़ अब्दुल्ला की अहेम भूमिका शुरू होती है. शेख़ अब्दुल्ला के पीछे भारत सरकार ने IB के जासूस लगाए थे. जासूसों ने बताया के अब्दुल्ल कश्मीर का सर्वसत्ताधीश बनना चाहता है. और वो तब सम्भव था जब कश्मीर राज्य को विशेषाधिकार प्राप्त हो… जासूसी की ये बात शेख़ अब्दुल्ला को पता लगी इस लिए उन्होंने पंडित नहेरू को कहा के आप अपने जासूस को वापस बुला ले वरना उसे हम कारागार में डाल देंगे. और ये तो अतिशयोक्ति ऊपर से ब्लैकमैलिग थी. राज्य सरकार का मुखिया भारत सरकार के मुखिया को ऑर्डर दे रहा था. लेकिन परिस्थितियों के सामने नहेरू ने जूकना वाजिब समजा. वैसे भी सरदार की तरह नहेरू में परिस्थिति का बेफ़ाम सामना करने की क़ाबिलियत नहीं थी. और ये ही उनकी कमज़ोरी भी थी.

कश्मीर के विलिनिकरन से पहेले कश्मीर के प्रधानमंत्री थे मेहरचंद महाजन. और महाजन को हटाकर अब शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री बने थे. लेकिन जबतक महाराजा हरिसिंह कश्मीर के अफ़िशली राजा हो तबतक अब्दुल्ला अपना काम स्वतंत्र रूप से नहि कर सकते था. इस लिए अब्दुल्ला ने हरिसिंह को महाराजा के पद से हटवाने के लिए नेहरु से अपील की. पता नहि क्यूँ पंडित नहेरू ने ये बात मान भी ली, और नहेरू ने हरिसिंग से त्यागपत्र माँगा.. मई 1949 में हरिसिंग ने कश्मीर की अपनी गद्दी के साथ राज्य भी छोड़ा और मुंबई आकर बसे. और 100 सलोसे भी अधिक कश्मीर पर राज करने वाले डोगरा वंशज के चौथे राजा हरिसिंह बाद में कभी वापस कश्मीर नहि गए.

अब आती है धारा 370 की बात.

शेख़ अब्दुल्ला को कश्मीर की सत्ता बेशक पंडित नहेरू की मदद से मिली थी. पर अब्दुल्ला हमेशा नेहरु की मदद के मोहताज नहि रहना चाहते थे. क्यूँकी नेहरु तो आज है और कल नहि है लेकिन कश्मीर में सत्ता उन्हें पीढ़ियों तक चलानी थी. इस लिए उन्होंने कश्मीर को एक विशिष्ट राज्य बनाने की माँग की. सच पूछो तो ये माँग एक अलग और विशिष्ट देश बनने से कम नहि थी. यहाँ पर ये बाई याद रहे के शेख़ अब्दुल्ला सिर्फ़ कश्मीर घाटी के नेता थे. जम्मू में उनका कोई ख़ास वर्चस्व ना था और लद्दाख़ के बुद्धों को तो उनसे कोई नहाने-निचोड़ने तक का रिश्ता ना था. फिर भी सत्ता के लिए शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरु सरकार की ब्लैकमेलिंग कर कश्मीर को एक विशिष्ट राज्य का दर्जा दिलवाया. नहेरू ब्लैकमेल हुए भी. अब अब्दुल्ला के लिए नेहरु को इतना जुकव क्यूँ था ये तो ईश्वर जाने लेकिन शेख़ अब्दुल्ला की हर बात का नेहरु ने स्वीकार किया. और कश्मीर को विशिष्ट राज का दरज्जा देने वाली कलम भरतिया संविधान के 360A में दाख़िल की गई. जो आख़िर कार अति विवादास्पद धारा 370 के नाम से जाने जाने लगी… यहाँ याद रहे के हमारे संविधान के रचेता डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर ने तो इस कमल का बहिष्कार किया था…

धारा 370 क्या है?

-दोस्तों शॉर्ट में समजे तो इसमें ऐसी जोगवाई है के कश्मीर का कोई भी नागरिक समस्त भारत देश का नागरिक है. यू कहे के उसे दोहरी नागरिकता प्राप्त है. लेकिन भारत देश के अन्य राज्यों का कोई भी नागरिक कश्मीर का नागरिक नहि है. एक सच बताऊँ तो First Citizen of India कहे जाने वाले हमारे राष्ट्रपति भी कश्मीर के नागरिक नहि हो सकते. है ना हसने वाली बात…

-भारत के किसी भी नागरिक को जम्मू कश्मीर में दुकान, मकान या प्रोपर्टी ख़रीदने का अधिकार नहि है है. ये अधिकार सिर्फ़ कश्मीर के परमेनेंट रेकिडेंट्स को ही दिया गया है. जबकि कश्मीर के लोग भारत के किसी भी हिस्से में कुछ भी ख़रीद सकते है.

-जम्मू-कश्मीर सरकार ने परमेनेंट रेकिडेंट्शिप की व्याख्या इस हद तक सीमित बनाई है के अगर कश्मीर की कोई युवती किसी अन्य स्टेट में शादी करती है तो उसकी नगरिकता ख़त्म हो जाएँगी. और इस परिस्थिति में पिता की मिलकत तो छोड़ो कश्मीर में उस युवती की ख़ुद की मिलकत पर भी उसका अधिकार ख़त्म हो जाएँगा. इस अधिनियम का जब 2002 में वहाँ की हाईकोर्ट ने खंडित किया तो महेबुबा मुफ़्ती की PDP सरकार ने PR Bill 2004 ला कर हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करवा लिया. और इसमें उनके कॉम्पटिटर उमार अब्दुल्ला यानी नेशनल कोनफ़रांस पार्टी ने महबूब का साथ भी दिया.

-और इन सब के अलावा भी इस स्टेट को कई विशेषाधिकार दिए गए है जिन्हें एक घंटे के विडियो में भी वर्णित करना सम्भव नहि है…

यहाँ पर समजने वाली बात ये है के इसी 370 धारा के कारण हमने हज़ारों सैनिक खोए है, इसी के कारण हमें पश्चिमी देश आए दिन ये सलाह देते रहेते है के कश्मीर के प्रश्न को भारत और पाकिस्तान को मिल कर हल करना चाहिए. इसी के कारण आज वहाँ आतंकवाद पनप रहा है और इसी के कारण आज पाकिस्तान विश्व स्तर पर कश्मीर की स्वतंत्रता का मुद्दा उठा रहा है. पाकिस्तान को तो कश्मीर 1948 से चाहिए था. पर भरतिया सैनिकों ने उसकी इस मुराद को नाकाम कर दिया और इसी लिए सालों से पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियाँ कर रहा है…

तो फिर अब इसका हल क्या है?

हल ये है के कश्मीर को ही 3 राज्यों में विभाजित कर देना चाहिए. लद्दाख़, जम्मू और कश्मीर… क्यूँकी आतंकवादी गतिविधियाँ लद्दाख़ और जम्मू में तो ना के बराबर है. और कश्मीर के छोटे हिस्से को अगर अलग कर दिया जाए तो हम उसे आसानी से कंट्रोल कर सकते है. और रही बात धारा 370 की तो जम्मू-कश्मीर की संविधानिक सभा के मंज़ूरी के बिना कश्मीर में कोई भी बदलाव नहि किए जा सकते. लेकिन अब तो संविधानिक सभा का अस्तित्व ही नहि है. तो मंज़ूरी किसकी लेनी??? सीधी सी बात ये है की क़लम 370 भारत के संविधान का हिस्सा है, भारत का संविधान 370 का हिस्सा नहि है…

ये स्क्रिप्ट मैंने बहोत समय पहेले लिखी थी. और इसपर मेरे यूट्यूब में विडियो डाली हुई है. पर आज ये धारा 370 हट चुकी है और ये अपने आप में एक ऐतिहासिक फ़ैसला है. और अब हम इस विस्तार को देश की मुख्य धारा से जोड़कर इसका विकास कर सकेंगे…

और अंत में: जैसे सत्ता मिलती नहि है, छिननी पड़ती है. वैसे ही कभी-कभी शांति भी मिलती नहि है, छिननी पड़ती है…

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