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अमेरिकन डोलर इंटरनेशनल करेंसी कैसे बना?

आज दुनिया में होने वाले 90% इंटरनेशनल ट्रानजेक्शन अमेरिकन डोलर में होते है और किसी भी देश की इकोनोमी इस आधार पर तय होती है की उस देश के फ़ोरेन रिज़र्व के अंदर कितने डोलर जमा है?

तो डोलर आख़िर इतना तगड़ा बना कैसे?

तो डोलर के पावरफुल होने की कहानी साल 1944 में शुरू होती है. जब द्वितीय विश्वयुद्ध अपने अंतिम चरण में था. दुनिया के ज़्यादातर देश बदहाली में जी रहे थे. अब सवाल ये था के जो देश तबह हो गए है उनका फिर से विकास कैसे किया जाए.

इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए 1944 में अमेरिका में एक सभा बुलाई गई. जिसे बेटनवुड कोनफ़रांस कहा जाता है. और इसी कोनफ़रांस में IMF और World-Bank के निर्माण के फ़ेसले लिए गए. अब उस वक़्त दुनिया में मात्रा अमेरिका ही एक ऐसा देश था जिसे विश्वयुद्ध में कोई ख़ास नुक़सान नहि हुआ था. और जिसकी इकोनोमी अभी भी पूरी दुनिया में सबसे स्टेबल थी. इसी किए IMF और World-Bank में होने वाले सभी ट्रेड को अमेरिकन डोलर में करने का फ़ेसला लिया गया. और ब्रिटन के सपोट से अमेरिकन डोलर इंटरनेशनल करेंसी बन गया.

इतना ही नहि, अमेरिकन प्रेसीडेंट रिचर्ड निक्सन ने साउदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को ये मनवा लिया के दुनिया में होने वाले सभी क्रूड ऑइल के सौदे सिर्फ़ अमेरिकन डोलर और बॉंड्ज़ के बदले में ही होने चाहिए. और इसके बदले अमेरिका ने इन ऑलफ़ील्ड देशों को सिक्यूरिटी देने का वादा किया.

अमेरिका में तकनीकी विकास कैसे हुआ?

आज अमेरिका टेक्नोलोजी में भी सबसे आगे है. वर्ल्ड लिडिंग कंपनीस, ओरगेनाइज़ेशनस, इंटेलीजेंस ब्यूरो, और दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी नासा ये सब आज अमेरिका में है. और इन सब के अमेरिका में होने की एक ख़ास एक वजह है और वो है के इस देश ने दुनिया के सभी बौद्धिक युवाधन को वेलकम किया और भारत, चीन और जापान जेसे देशों के कई एंजिनियर्स, मेथेमेटिसियन, फिसिसिस्ट अमेरिका जा कर बसे. इनसे अमेरिका की इकोनोमी को बहित फ़ायदा हुआ…

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